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मंडी

लॉकडाउन के बाद ऐतिहासिक रिवालसर झील भी हुई साफ़

5 May 2020 1:44 AM GMT
लॉकडाउन के बाद ऐतिहासिक रिवालसर झील भी हुई साफ़
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पिछले चार महीनों में हमारी दुनिया एकदम बदल गई है। पूरी दुनियां पर एक नए कोरोना वायरस का क़हर टूटा है। हज़ारों लोगों की जान चली गई। लाखों लोग बीमार पड़े हुए हैं। और, जो लोग इस वायरस के प्रकोप से बचे हुए हैं, उनका रहन सहन भी एकदम बदल गया है। ये वायरस दिसंबर 2019 में चीन के वुहान शहर में पहली बार सामने आया था। उसके बाद से दुनिया में सब कुछ उलट पुलट हो गया। इससे बचने के लिए लगभग पुरे विश्व को लॉक डाउन करना पड़ा और लोगों के बचाव के लिए उन पर कई पाबंदियां लगानी पड़ी किन्तु पाबंदियों का एक नतीजा ऐसा भी निकला है, जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। अब सुबह अक्सर नींद अलार्म से नहीं, परिंदों के शोर से खुलती है। जिनकी आवाज़ भी हम भूल चुके थे। नदियाँ और झीलों का पानी एकदम साफ़ हो गया है ।

ऐसी ही एक झील से हम आज आपको रूबरू करवाने जा रहे है और ये झील है हिमाचल प्रदेश के मंडी जिला में स्थित रिवालसर झील। ऐतिहासिक रिवालसर झील भी लॉकडाउन के बाद जैसे मानो जी उठी है । झील का पानी साफ हुआ तो उसकी रानी मछली भी चहक उठी। पानी में ऑक्सीजन की मात्रा कम होने से झील व इसमें मौजूद मछलियों का दम निरंतर घुट रहा था। हर साल हजारों मछलियां मरती थी। झील में प्रदूषण का स्तर 70 फीसद से अधिक गिरा है। बड़ा कारण रहा छेश्चु और बैसाखी मेला नहीं हुआ। मेलों के बाद झील में प्रदूषण का स्तर चार गुणा तक बढ़ जाता था और जल की रानी घुटन की शिकार होकर मर जाती थी। प्रदूषण की वजह से झील के पानी की पीएच (हाइड्रोजन आयन) घटकर दो तक पहुंच जाती थी।

सामान्यत पीएच चार से सात के बीच होना चाहिए। पीपीएम (पार्ट पर मिलियन) का स्तर भी 8 से 9 के बीच रहना चाहिए। सालभर पहले यहां पीपीएम का स्तर 12 तक आंका गया था। इससे पानी में घुलनशील ऑक्सीजन की मात्रा कम होने से मछलियां दम घुटने से मरती थी। पीएच कम होने से पानी अम्लीय हो जाता था। झील के मौजूदा स्वरूप को बरकरार रखने के लिए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सोमवार से निगरानी शुरू करेगा। उपायुक्त मंडी से अनुमति मांगी गई है। इसकी पुष्टि बोर्ड के अधिकारी अतुल परमार भी करते हैं। मत्स्य विभाग के सहायक निदेशक खेम सिंह ठाकुर भी कहते हैं कि प्रदूषण स्तर कम होने से इस बार मछलियां पूरी तरह सुरक्षित हैं।

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